देशभर में चुनाव आयोग स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है। दावा है—लोकतंत्र को पारदर्शी बनाने का अब तक का सबसे बड़ा प्रयास। पर इसी प्रयास के बीच उठ रहे हैं सवाल… बढ़ रही है जनता की उलझन… और दबाव में टूट रहे हैं लोकतंत्र के वे सिपाही—जिन्हें हम BLO कहते हैं।SIR मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका सीधा मकसद है ग़लतियों को सुधारना, फर्जी वोटिंग रोकना और लिस्ट को अपडेट करना।लेकिन सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों ने जनता को भ्रमित कर दिया है।कई लोग डर रहे हैं—‘अगर SIR के दौरान मेरा नाम वोटर लिस्ट से कट गया… तो क्या मुझे देश से बाहर कर देंगे? ’साफ़ शब्दों में बिल्कुल नहीं। SIR का नागरिकता से कोई लेना–देना नहीं। यह सिर्फ वोटर सूची को शुद्ध करने का अभियान है।ऑनलाइन फॉर्म सिर्फ वही भर सकते हैं जिनका मोबाइल नंबर वोटर ID से लिंक है। नहीं लिंक? तो BLO की मदद से फॉर्म भरना ही एकमात्र रास्ता है।“देशभर में लाखों ऐसे नाम मतदाता सूची में मौजूद हैं जिनका निधन हो चुका है, या जो एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं।
SIR के बाद हर व्यक्ति सिर्फ एक ही स्थान से वोटर बन सकेगाहा EPIC नंबर का डेटा और मजबूत होगा चुनावी प्रक्रिया और पारदर्शी होगी और यही कारण है कि चुनाव आयोग इसे लोकतंत्र की सफाई अभियान की तरह देख रहा है। SIR के राजनीतिक विवादों और जनता की परेशानियों के बीच एक सच्चाई छुप गई है—और वो हैं BLO, यानी बूथ लेवल अधिकारी।ये लोग कोई अलग सरकारी विभाग नहीं हैं।ये वही लोग हैं जिनसे हम रोज मिलते हैं स्कूलों के अध्यापक, शिक्षा मित्र, सरकारी कर्मचारी। कई BLO ने कहा हम SIR के खिलाफ नहीं, पर हमें सम्मान चाहिए… धमकियां नहीं। लेकिन जमीन पर हालात अलग हैं।कई जगह BLO पर टारगेट पूरा करने का दबाव बढ़ रहा है। एक BLO ने में एक म क टारगेट पूरा न करने पर FIR की धमकी तक दी गई।’ और यह दबाव कई बार मौत का कारण बन रहा है। मध्यप्रदेश में 2 BLO की हार्ट अटैक से मौत पश्चिम बंगाल में महिला BLO ने आत्महत्या कर ली नादिया में एक BLO का शव घर की छत से लटका मिला जयपुर में एक BLO ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दी गुजरात में 4 BLO अब इस दुनिया में नहीं सरकार का जवाब—‘पुरानी बीमारी थी।’पर परिवारों का आरोप—‘तनाव ही मौत की वजह था।’ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं—ये लोकतंत्र की वो दरारें हैं जो समाज अक्सर देखना ही नहीं चाहता।चुनाव आयोग का गणित कुछ और कहता है।
एक बूथ में औसतन 800 से 1200 वोटर यानी करीब 300 घर.. BLO को हर घर सिर्फ दो चक्कर लगाने होते हैं एक बार फॉर्म देने और दूसरी बार फॉर्म लेने। समय—30 दिन।यानी रोज 20 घर। किसी ई-कॉमर्स डिलीवरी ब्वॉय की तरह जो रोज 30–60 घर कवर करता है।तो क्या समस्या वास्तव में वर्कलोड की है? या दबाव बनाने वाले अफसरों की? या गलत प्रबंधन की?जवाब शायद तीनों का मिश्रण है। क्योंकि घर-घर जाकर फील्ड वर्क करने के बाद BLO को दफ्तर में बैठकर घंटों पेपरवर्क भी करना होता है। और यही काम मानसिक दबाव में बदल जाता है।UP में SIR को लेकर राजनीतिक तापमान भी बढ़ गया है।समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने SIR को ‘महा-षड्यंत्र’ बताया है।
उनका दावा ‘आज वोट काटे जा रहे हैं, कल आरक्षण, राशन, जाति और जमीन तक से नाम हट जाएगा… और बात बैंक लॉकर तक पहुंच जाएगी।’उन्होंने विपक्षी दलों और NDA के सहयोगी दलों से अपील की कि वे ‘BJP के इस कथित षड्यंत्र’ के खिलाफ एकजुट हों।राजनीति अपने शबाब पर है लेकिन ग्राउंड पर काम कर रहे BLO इस राजनीतिक शोर के बीच चुपचाप फाइलों में दबे जा रहे हैं, और कईयों की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो चुकी है। जनता की सबसे बड़ी चिंता ‘नाम कट जाएगा।’ लेकिन आयोग बार-बार कह रहा है अगर आपके दस्तावेज़ सही हैं, नाम हटने का कोई खतरा नहीं। समस्या सिर्फ इतनी है कि कई लोगों का मोबाइल नंबर वोटर ID से लिंक नहीं है।और ऐसे लोगों को ऑनलाइन फॉर्म भरने ही नहीं दिया जाता। BLO ही उनका सहारा हैं।और यही वजह है कि BLO का रोल इतना महत्वपूर्ण, और इतना संवेदनशील हो गया है। 2021 में भी यूपी पंचायत चुनाव के दौरान 1600 से ज्यादा शिक्षकों की मौत हुई थी।सरकार ने तब भी कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया। सिर्फ बाद में मुआवजे का ऐलान हुआ। आज… चार साल बाद फिर वही हालात। तब कारण था कोरोना आज कारण बन गया है SIR। क्या लोकतंत्र की सेवा करने की कीमत हमेशा ‘जान’ ही रहेगी? SIR लोकतंत्र की सफाई का अभियान है। मकसद सही है, लेकिन रास्ता बेढंगा। जनता भ्रमित है। राजनीति गरम है।और BLO जो इस सिस्टम का सबसे जरूरी हिस्सा हैं वे ही सबसे ज़्यादा टूट रहे हैं। ये कहानी सिर्फ वोटर लिस्ट की नहीं…ये कहानी है
लोकतंत्र के उन गुमनाम सिपाहियों की जो दूसरों के वोट बचाने में लगे हैं, पर खुद अपनी जिंदगी बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। तो SIR का उद्देश्य साफ़ है मतदाता सूची को शुद्ध और पारदर्शी बनाना। अगर आपके दस्तावेज़ सही हैं, तो आपका नाम सुरक्षित रहेगा।देशवासियों को चाहिए कि वे इस प्रक्रिया को समझें, अफवाहों से दूर रहें और अपने मतदाता अधिकारों को सुरक्षित रखें।









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