SitapurNews: यूपी के जिला सीतापुर में उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के ट्रांसमिशन विभाग में भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आरोप है कि लखनऊ स्थित ZAO ट्रांसमिशन कार्यालय में कर्मचारियों को अपने ही कॉन्ट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड (CPF) की धनराशि निकालने के लिए रिश्वत देनी पड़ रही थी।
सबसे गंभीर बात यह है कि यह रकम किसी ऐशो-आराम के लिए नहीं, बल्कि कर्मचारियों के परिवार—विशेषकर बीमार बच्चों और परिजनों—के इलाज के लिए मांगी जा रही थी। सूत्रों के अनुसार कार्यालय में कथित तौर पर “रेट कार्ड” तय था। मोटी रकम मिलने पर फाइलों को तत्काल स्वीकृति देकर भुगतान कर दिया जाता था, जबकि कम या बिना रिश्वत वाली फाइलें महीनों तक लंबित रखी जाती थीं।
कुछ कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि रिश्वत न देने पर उन्हें डराया-धमकाया भी जाता था। जानकारों का कहना है कि इस अवैध वसूली की रकम का हिस्सा ऊपर तक पहुंचता था, जिससे संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के हौसले बुलंद थे।
मामले की गूंज जब शक्ति भवन मुख्यालय तक पहुंची तो जांच कमेटी गठित की गई। जांच में प्रथम दृष्टया आरोप सही पाए गए। इसके बाद निदेशक (कार्मिक) ट्रांसमिशन ने मुख्य आरोपी कार्मिक को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
हालांकि, कर्मचारियों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या केवल निलंबन पर्याप्त है? सूत्रों के मुताबिक, कर्मचारी आचरण नियमावली 1956 के तहत संबंधित दोषियों को चार्जशीट देने और व्यापक अनुशासनात्मक कार्रवाई की तैयारी चल रही है।
बताया जा रहा है कि अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने भी अन्य संभावित संलिप्त अधिकारियों की भूमिका की जांच के निर्देश दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के इस कथित तंत्र को जड़ से खत्म कर पाएगी या फिर बड़े चेहरों पर भी कार्रवाई होगी।
यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि क्या बीमार बच्चों के इलाज के पैसों पर भी भ्रष्टाचार की परछाईं पड़ सकती है?













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