अप्रैल का महीना हर साल नई उम्मीदें लेकर आता है, लेकिन देश के लाखों परिवारों के लिए यही समय चिंता और दबाव का कारण बन जाता है। यह वही दौर है जब एक पिता अपने बच्चे का हाथ पकड़कर स्कूल पहुंचता है, मगर उसकी नजर स्कूल की इमारत पर नहीं, बल्कि अपनी जेब पर होती है।
आज शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। जो कभी समाज सेवा का माध्यम हुआ करता था, वह अब एक महंगे “बिजनेस मॉडल” में बदलता नजर आ रहा है। स्कूलों में एडमिशन फीस, एनुअल चार्ज, स्मार्ट क्लास फीस और डेवलपमेंट फीस के नाम पर अभिभावकों से भारी रकम वसूली जाती है, लेकिन इन खर्चों का वास्तविक लाभ क्या है, यह समझना मुश्किल हो गया है।
सबसे बड़ी परेशानी किताबों और यूनिफॉर्म को लेकर सामने आती है। हर साल नया सिलेबस लागू कर दिया जाता है और किताबें केवल तय दुकानों से खरीदने का दबाव बनाया जाता है। सवाल यह है कि क्या हर साल ज्ञान बदल जाता है, या यह सिर्फ मुनाफा कमाने का जरिया बन गया है? पहले एक ही किताब कई बच्चों के काम आ जाती थी, लेकिन अब हर साल नई किताबें खरीदना मजबूरी बन गया है।
यूनिफॉर्म के मामले में भी यही स्थिति है। खुले बाजार में सस्ती उपलब्धता के बावजूद, अभिभावकों को “फिक्स दुकानों” से ही खरीदारी करने के लिए बाध्य किया जाता है। इससे आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है, खासकर मिडिल क्लास परिवारों पर, जो न तो किसी सरकारी सहायता के पात्र होते हैं और न ही इन खर्चों को आसानी से वहन कर पाते हैं।
सरकारी स्कूलों में संसाधन होने के बावजूद गुणवत्ता की कमी देखी जाती है, जबकि निजी स्कूलों में बेहतर सुविधाएं हैं, लेकिन उनकी फीस आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब शिक्षा भी “बैंक बैलेंस” के आधार पर तय होगी?
अब समय आ गया है कि इस व्यवस्था में बदलाव लाया जाए। फीस पर नियंत्रण हो, किताबें एक समान हों और यूनिफॉर्म खुले बाजार में उपलब्ध हो। क्योंकि जब एक गरीब का बच्चा पढ़ता है, तो केवल उसका परिवार नहीं, बल्कि पूरा देश आगे बढ़ता है।अगर शिक्षा महंगी हो जाएगी, तो समाज सस्ता हो जाएगा—और यह किसी भी देश के भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
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