अप्रैल का महीना… किसी के लिए नई उम्मीदें लेकर आता है, तो किसी के लिए नई बेचैनी। जब एक मध्यमवर्गीय या गरीब पिता अपने बच्चे का हाथ पकड़कर स्कूल की चौखट पर खड़ा होता है, तो उसकी नजर स्कूल की बिल्डिंग से ज्यादा अपनी जेब पर होती है। हम सब चाहते हैं कि हमारा बच्चा अफसर बने, डॉक्टर बने, बड़ा इंसान बने। लेकिन जैसे ही एडमिशन काउंटर पर फीस का चार्ट सामने आता है, वैसे ही वो बड़े सपने धुंधले पड़ने लगते हैं।
बेबसी का वो मंजर सोचिए, उस बाप के दिल पर क्या बीतती होगी जब उसका होनहार बच्चा कहता है, “पापा, मुझे भी उस बड़े स्कूल में जाना है जहाँ सब टाई लगाकर जाते हैं।” और बाप बेबसी में सिर्फ अपना सिर झुका लेता है क्योंकि घर का राशन और बच्चे की फीस के बीच उसे राशन को चुनना पड़ता है।क्या अच्छी शिक्षा केवल अमीरों का ‘प्रीमियम’ हक है? क्या गरीब के बच्चे की प्रतिभा का कोई मोल नहीं है?
सरकारी और प्राइवेट के बीच पिसता बचपन हमारे देश में अजीब सी खाई बन गई है।
प्राइवेट स्कूल: यहाँ शिक्षा तो अच्छी है, लेकिन फीस आसमान छू रही है। स्कूल अब मंदिर नहीं, ‘शोरूम’ बन गए हैं। हर साल बढ़ती फीस, ड्रेस, किताबों के नाम पर जो लूट मची है, उसने मिडिल क्लास की कमर तोड़ दी है।
सरकारी स्कूल: यहाँ तनख्वाह अच्छी है, इमारतें भी हैं, लेकिन वो माहौल और गुणवत्ता गायब है जिसकी उम्मीद एक जागरूक पेरेंट्स करते हैं। क्यों एक सरकारी कर्मचारी या एक पढ़ा-लिखा इंसान अपने बच्चे को वहां भेजने से डरता है?
सवाल सरकार से है जब ‘एक राशन’ तो ‘एक शिक्षा’ क्यों नहीं?
जब देश “एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड” की बात कर सकता है, तो “एक राष्ट्र, एक शिक्षा प्रणाली” की मांग क्यों नहीं की जा सकती? अमीर का बच्चा और गरीब का बच्चा एक ही बेंच पर बैठकर क्यों नहीं पढ़ सकते?
क्यों शिक्षा को एक व्यापार बनने दिया जा रहा है? क्यों प्राइवेट स्कूलों की फीस पर कोई सख्त लगाम नहीं है? सरकारी स्कूलों का स्तर इतना ऊपर क्यों नहीं उठाया जाता कि लोग प्राइवेट की तरफ देखना ही छोड़ दें?
यह केवल पैसे की नहीं, बराबरी की लड़ाई है शिक्षा कोई ‘लक्जरी’ या विलासिता की वस्तु नहीं है जिसे सिर्फ अमीर ही खरीद सकें। यह हर बच्चे का मौलिक अधिकार है। किसी बच्चे का भविष्य इसलिए बर्बाद नहीं होना चाहिए क्योंकि उसके माता पिता के पास बैंक बैलेंस कम है। “बच्चे के बस्ते का बोझ तो हम उठा लेंगे साहब, पर इस महंगी फीस का बोझ अब नहीं उठता।”
वक्त की मांग है अब हमें एक ऐसे सिस्टम की जरूरत है जहाँ: स्कूलों की फीस न्यूनतम और फिक्स हो। सरकारी स्कूलों को प्राइवेट से भी बेहतर बनाया जाए ताकि गरीब का बच्चा भी बड़े सपने देख सके। शिक्षा के नाम पर होने वाली इस ‘दुकानदारी’ को बंद किया जाए। समाज और सरकार को मिलकर यह सोचना होगा कि अगर आज हमने इन सपनों को पैसों की दीवार से रोका, तो कल का भारत कमजोर होगा। शिक्षा सबको समान मिले, सम्मान से मिले।
“याद रखिये… जब एक अमीर का बच्चा पढ़ता है, तो उसका खानदान आगे बढ़ता है। लेकिन जब एक गरीब का बच्चा पढ़ता है, तो पूरा देश आगे बढ़ता है।
पर आज हमने शिक्षा के चारों ओर पैसों की जो ऊंची दीवार खड़ी कर दी है, वो सिर्फ स्कूल की बाउंड्री नहीं है… वो इस देश के करोड़ों होनहार बच्चों के सपनों की शमशान है।
आज फैसला आपको करना है—क्या हम अपने बच्चों को सिर्फ ‘मजदूर’ और ‘नौकर’ बनाने के लिए पैदा कर रहे हैं? या हम उन्हें वो पंख देंगे जिससे वो आसमान छू सकें?मेरी मांग सीधी है: किताबें एक हों, स्कूल एक हों, और फीस इतनी हो कि एक ईमानदार पिता को अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए अपनी किडनी न बेचनी पड़े, अपना आत्मसम्मान न गिरवी रखना पड़े।
आज अपने बच्चे के भविष्य के लिए आवाज उठाइये क्योंकि अगर आज हम नहीं बोले, तो कल हमारे बच्चे हमसे पूछेंगे—’पापा, जब मेरा भविष्य बिक रहा था, तब आप चुप क्यों थे?’ खामोशी तोड़िये। शिक्षा को व्यापार से आज़ाद कराइये।






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