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Journalist Pratiksha Verma: AI के दौर में बदलती पत्रकारिता की तस्वीर, क्या हम सच देख रहे हैं… या सिर्फ उसका एक बना हुआ रूप?

प्रतीक्षा वर्मा की कलम से

संपादकीय: प्रतीक्षा वर्मा की कलम से

Journalist Pratiksha Verma:आज पत्रकारिता एक बड़े मोड़ पर खड़ी है, जहां स्क्रीन की चमक और ज़मीन की सच्चाई के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। यही दूरी आने वाले समय में यह तय करेगी कि लोग खबरों पर भरोसा करेंगे या नहीं। पत्रकारिता का मूल स्वभाव हमेशा से सत्ता से सवाल करना, समाज के बीच मौजूद रहना और सच को सामने लाने का साहस दिखाना रहा है, लेकिन आज जब तकनीक ने हर हाथ में एक “न्यूज़रूम” दे दिया है, तब यह सवाल पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या हम वास्तव में सच देख रहे हैं या सिर्फ उसका एक सजा हुआ और तैयार किया गया रूप।

एक ओर वे पत्रकार हैं जो धूप और बारिश में ज़मीन पर उतरकर लोगों के बीच जाते हैं, हालात को समझते हैं, असहज सवाल पूछते हैं और अपनी मेहनत, ईमानदारी व अनुभव के बल पर भरोसा बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर अब केवल एक फोटो, एक स्क्रिप्ट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सहारे “न्यूज़ एंकर” तैयार हो रहा है—जिसके पास तैयार चेहरा है, तैयार आवाज़ है और तैयार खबर है, लेकिन ज़मीन की सच्चाई का अनुभव नहीं है। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि समस्या तकनीक में नहीं है, क्योंकि तकनीक समय की आवश्यकता है और उसका उपयोग भी जरूरी है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है।

पत्रकारिता केवल शब्दों को पढ़ देने या खबर को प्रस्तुत करने का नाम नहीं है, बल्कि यह अनुभव, संवेदनशीलता और वास्तविक परिस्थितियों से जुड़े रहने की एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें भीड़ के बीच खड़े होकर सवाल पूछने का साहस, जोखिम उठाने की क्षमता और हर जवाब के पीछे छिपे नए सवाल को तलाशने की समझ शामिल होती है। जब एक रिपोर्टर घटनास्थल पर मौजूद होकर लोगों की आवाज़ को सुनता है, उनकी समस्याओं को महसूस करता है और बिना किसी डर के उन्हें सामने लाता है, तभी असली पत्रकारिता सामने आती है।

लेकिन आज के दौर में स्क्रीन पर सब कुछ आसान होता जा रहा है, जहां AI के माध्यम से कोई भी व्यक्ति “एंकर” बन सकता है। भले ही उसे न ज़मीन की समझ हो, न परिस्थितियों की गंभीरता का अंदाजा और न ही सवालों की गहराई का अनुभव—फिर भी खबर दर्शकों तक पहुंच रही है। यही वह बिंदु है जहां चिंता शुरू होती है, क्योंकि जब दिखावा सच्चाई की जगह लेने लगता है, तो पत्रकारिता की विश्वसनीयता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है और लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है।

ऐसे समय में जरूरत इस बात की नहीं है कि कौन कितना प्रभावशाली दिख रहा है, बल्कि इस बात की है कि कौन सच के कितना करीब है। हमें यह तय करना होगा कि हमें केवल आकर्षक चेहरे चाहिए या वह आवाज़ जो वास्तव में समाज के लिए सवाल उठाती है और जवाब मांगती है। तकनीक का उपयोग जरूर होना चाहिए, लेकिन सच की कीमत पर नहीं, क्योंकि अंततः भरोसा उसी पर बनता है जो ज़मीन से जुड़ा होता है, जो वास्तविकता को समझता है और जो सच के साथ खड़ा रहता है।

स्क्रीन पर दिखना आज आसान हो गया है, लेकिन ज़मीन पर जाकर सच्चाई को सामने लाना आज भी उतना ही कठिन है, और शायद यही अंतर आने वाले समय में यह तय करेगा कि पत्रकारिता पर लोगों का भरोसा बना रहेगा या नहीं। अंत में वही पत्रकार टिकेगा जो अपने दम पर खड़ा होगा, जो अपने “पंखों” से उड़ान भरेगा—न कि किसी तैयार की गई “डाल” के सहारे।

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