Journalist Pratiksha Verma: संत प्रेमानंद महाराज… आज देश ही नहीं, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में करोड़ों लोग जिन्हें सुनते हैं। उनकी बातें सुनने वालों में आम इंसान से लेकर समाज के जाने-पहचाने चेहरे तक शामिल हैं। लोग वृंदावन पहुंचते हैं, उनके प्रवचन सुनते हैं, राधा नाम का जाप करते हैं और उनके बताए रास्ते से अपने जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं।
मैं भी स्वयं प्रेमानंद जी महाराज को सुनती हूं
उनकी बातें मेरे लिए सिर्फ आध्यात्मिक बातें नहीं हैं। कई बार उनकी कही हुई बातें जीवन को देखने का नजरिया बदल देती हैं। मन परेशान हो, जीवन में कोई उलझन हो या खुद से ही सवाल करने का समय हो—उनके विचारों में मुझे हमेशा आत्मचिंतन, संयम और सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिली है। इसीलिए जब आज प्रेमानंद महाराज के नाम को एक विवाद से जोड़कर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो मन में स्वाभाविक रूप से गुस्सा भी आता है और दुख भी। लेकिन पत्रकार होने के नाते एक बात मैं खुद से भी पूछती हूं—क्या मेरी आस्था इतनी मजबूत है कि सवाल सुनकर भी मैं सच का इंतजार कर सकूं?और शायद यही वह सवाल है, जिस पर आज हम सभी को विचार करने की जरूरत है।
हाल ही में प्रेमानंद महाराज के शिष्य दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने कई सवाल खड़े किए हैं। सामने आई जानकारी के मुताबिक 25 सितंबर को दीपक ने वृंदावन स्थित गुरु कृपा कुंज की चौथी मंजिल से कूदकर जान दे दी।
घटना के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। आश्रम के कई साधकों से पूछताछ की गई, मृतक के परिजनों के बयान दर्ज किए गए, CCTV फुटेज खंगाले गए और मृतक के मोबाइल तथा रक्त के नमूने जांच के लिए भेजे गए। इस मामले में SIT जांच की मांग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखे जाने की बात भी सामने आई है। जांच के दौरान कुछ ऐसे सवाल भी सामने आए हैं जिनका जवाब पुलिस तलाश रही है।सबसे बड़ा सवाल यह बताया जा रहा है कि छत से कूदने से पहले मृतक ने अपना गुप्तांग क्यों काटा? आखिर उस रात क्या हुआ था? क्या कोई ऐसी परिस्थिति थी जिसने उसे इतना बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर किया? इन सवालों के जवाब अभी जांच का विषय हैं।
इसी बीच कुछ संतों की ओर से प्रेमानंद महाराज के आश्रम छोड़कर दूसरे स्थान पर चले जाने की बातें भी सामने आईं। वहीं आश्रम प्रबंधन की ओर से घटना पर दुख व्यक्त करते हुए जांच में सहयोग की बात कही गई। अब यहीं से बात सिर्फ एक मौत की जांच तक सीमित नहीं रह जाती। सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में प्रेमानंद महाराज के ऊपर भी सवाल उठने लगे हैं। और यहीं मुझे सबसे ज्यादा चिंता होती है।
क्योंकि सवाल पूछना गलत नहीं है। लेकिन सवाल का जवाब आने से पहले किसी को दोषी मान लेना क्या सही है?
अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई है तो उसके परिवार को न्याय मिलना चाहिए। अगर कोई अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अगर कोई दोषी है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यह सब जांच के बाद होना चाहिए, न कि सोशल मीडिया के निष्कर्षों के आधार पर।आज हमारे समाज में एक अजीब प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
हम किसी व्यक्ति को पसंद करते हैं तो उसकी हर बात को सही मान लेते हैं और जब किसी व्यक्ति के बारे में कोई सवाल उठता है तो बिना पूरी जानकारी के उसकी हर बात में गलतियां तलाशने लगते हैं।
क्या यही हमारी सोच होनी चाहिए?
मैं प्रेमानंद जी महाराज को सुनती हूं, इसलिए उनके प्रति मेरे मन में सम्मान और आस्था है। लेकिन मेरी आस्था का अर्थ यह नहीं कि किसी भी सवाल की जांच नहीं होनी चाहिए। जांच होनी चाहिए। पूरी होनी चाहिए। निष्पक्ष होनी चाहिए। लेकिन जांच और आरोप में अंतर है। किसी घटना के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है। मगर सवालों को ही अंतिम सत्य मान लेना खतरनाक है। आज प्रेमानंद महाराज को करोड़ों लोग सुनते हैं। उनकी बातों से कितने लोगों को मानसिक शांति मिली, कितने लोगों ने अपने जीवन में बदलाव महसूस किया—यह हर व्यक्ति का अपना अनुभव है। मैं भी उन्हीं लोगों में से एक हूं।
उनकी बातें मैंने सुनी हैं और मुझे उनमें जीवन से भटकाने वाली बात नहीं, बल्कि जीवन को समझने और अपने भीतर झांकने की सीख मिली है। इसलिए जब कोई बिना पूरी सच्चाई सामने आए उनके ऊपर गंभीर सवाल उठाता है, तो मन आहत होता है। लेकिन शायद यही समय है जब हमें अपने गुस्से को भी विवेक में बदलना होगा। क्योंकि अगर हम चाहते हैं कि लोग बिना प्रमाण किसी संत पर आरोप न लगाएं, तो हमें भी बिना प्रमाण किसी आरोप लगाने वाले को गलत ठहराने से बचना होगा।
सच किसी के पक्ष में नहीं होता। सच सिर्फ सच होता है। दीपक लोधी उर्फ रसिक दुलारी शरण की मौत का वास्तविक कारण क्या था, यह जांच से सामने आना चाहिए। उनके परिवार को न्याय मिलना चाहिए। और अगर इस पूरे मामले में कोई दोषी है तो वह सामने आना चाहिए।
लेकिन तब तक हमें थोड़ा ठहरना चाहिए। न प्रेमानंद महाराज को बिना जांच के दोषी मानना उचित है, न किसी सवाल को उठाने वाले को बिना सुने खारिज करना। क्योंकि आस्था और विवेक एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। आस्था रखिए, लेकिन विवेक के साथ। सवाल पूछिए, लेकिन प्रमाण के साथ। आलोचना कीजिए, लेकिन निष्पक्षता के साथ। और सबसे जरूरी—किसी की मृत्यु को किसी व्यक्ति की छवि पर फैसला सुनाने का आधार बनाने से पहले उस मृत्यु का सच सामने आने दीजिए।
शायद आज प्रेमानंद महाराज से ज्यादा सवाल हम सबको खुद से पूछने की जरूरत है क्या हम सच जानना चाहते हैं, या सिर्फ वही सुनना चाहते हैं जो हमारी पहले से बनी राय को सही साबित कर दे?
प्रतीक्षा वर्मा की कलम से📝📝📝📝



