Journalist Pratiksha Verma:जब पत्रकार की पहचान उसके सवालों से नहीं, बल्कि उसकी कथित राजनीतिक निष्ठा से होने लगे; जब सच दिखाने वाले को ‘पेड पत्रकार’ कहकर खारिज कर दिया जाए और पत्रकारिता को सत्ता तथा विपक्ष के खेमों में बांट दिया जाए, तब सवाल केवल मीडिया की विश्वसनीयता का नहीं, बल्कि पत्रकार के सम्मान, अस्तित्व और भविष्य का भी है।
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह वह जिम्मेदारी है, जिसके कंधों पर समाज को सच से परिचित कराने, सत्ता से सवाल पूछने और आम आदमी की आवाज को व्यवस्था तक पहुंचाने का दायित्व है। लेकिन आज पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर उठते सवालों के बीच एक और गंभीर प्रश्न खड़ा है—आखिर उस पत्रकार का क्या, जो किसी राजनीतिक खेमे का हिस्सा नहीं बनना चाहता, जो किसी के इशारे पर नहीं, बल्कि अपने विवेक और तथ्यों के आधार पर खबर करना चाहता है?
आज पत्रकारिता की दुनिया में एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। एक ओर पत्रकारिता को लोकतंत्र की रीढ़ बताया जाता है, दूसरी ओर पत्रकारों को ही संदेह की नजर से देखा जाने लगा है। किसी खबर से असहमति हो तो पत्रकार पर पक्षपात का आरोप लगा दिया जाता है। किसी सत्ता से सवाल पूछे तो उसे विरोधी खेमे का बता दिया जाता है, और किसी विपक्ष की आलोचना करे तो उसे सत्ता का समर्थक करार दे दिया जाता है।
ऐसे माहौल में स्वतंत्र पत्रकारिता की जगह कहां बचती है? क्या पत्रकार का काम किसी पक्ष के साथ खड़ा होना है, या जनता के सामने सच और तथ्य रखना?
यह सवाल आज केवल मीडिया संस्थानों के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समाज के लिए विचारणीय है।
‘पेड पत्रकार’ का तमगा और भरोसे का संकट
पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठना कोई छोटी बात नहीं है। जब जनता का भरोसा मीडिया से डगमगाता है, तो नुकसान केवल किसी एक पत्रकार या समाचार संस्थान का नहीं होता, बल्कि उन नागरिकों का भी होता है जो सही जानकारी के लिए मीडिया की ओर देखते हैं।
लेकिन इस संकट का एक दूसरा पहलू भी है। आज ‘पेड पत्रकार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कई बार बिना किसी प्रमाण के पत्रकारों को अपमानित करने के लिए किया जाता है। किसी पत्रकार की रिपोर्ट पसंद नहीं आई, उसकी राय से सहमति नहीं बनी या उसने किसी प्रभावशाली व्यक्ति से असुविधाजनक सवाल पूछ लिया, तो उसकी नीयत पर ही सवाल खड़े कर दिए जाते हैं।
यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—यदि कोई पत्रकार पैसे या निजी लाभ के बदले खबर को प्रभावित करता है, तो उसकी जांच और जवाबदेही होनी चाहिए। पत्रकारिता के नाम पर प्रचार करना गलत है। लेकिन बिना प्रमाण हर असहमत आवाज को बिकाऊ बता देना भी उतना ही अनुचित है।
खबर की आलोचना तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, पत्रकार के चरित्र पर बेबुनियाद हमला करके नहीं।
पत्रकार से सवाल पूछिए। उसकी खबर में गलती है तो प्रमाण के साथ बताइए। उसने तथ्य गलत प्रस्तुत किए हैं तो उसे जवाबदेह बनाइए। लेकिन हर उस पत्रकार को कटघरे में खड़ा कर देना, जो आपके विचारों से सहमत नहीं है, स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद का रास्ता नहीं है।
विश्वसनीयता केवल पत्रकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाचार संस्थानों की संपादकीय ईमानदारी, पारदर्शिता और पाठकों के विवेक से भी जुड़ी है।
सत्ता की मीडिया, विपक्ष की मीडिया—स्वतंत्र पत्रकार किसके साथ जाए?
आज मीडिया के एक हिस्से को लेकर यह धारणा मजबूत हुई है कि कोई सत्ता के पक्ष में खड़ा है, कोई विपक्ष के पक्ष में और कोई किसी विशेष विचारधारा के साथ अपनी पहचान बनाता है। हालांकि सभी मीडिया संस्थानों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा, लेकिन इस धारणा का बढ़ना अपने आप में गंभीर चिंता का विषय है।
जब खबरों को राजनीतिक चश्मे से देखा जाने लगे, तब पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना।
यदि सरकार की किसी नीति में कमी है, तो क्या पत्रकार को सवाल नहीं पूछना चाहिए? यदि विपक्ष का कोई दावा तथ्यों पर खरा नहीं उतरता, तो क्या उसे उजागर नहीं करना चाहिए? यदि किसी आम नागरिक के साथ अन्याय होता है, तो क्या उसकी आवाज इसलिए नहीं उठाई जाए कि उससे किसी राजनीतिक दल को असुविधा हो सकती है?
पत्रकारिता किसी राजनीतिक दल की स्थायी समर्थक या स्थायी विरोधी नहीं हो सकती। उसका दायित्व तथ्यों, जनहित और जवाबदेही के प्रति होना चाहिए।
स्वतंत्र पत्रकार की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वह किसी दल के लिए नहीं, बल्कि अपने पाठकों और दर्शकों के प्रति जवाबदेह हो।
लेकिन जब हर खबर को पक्ष और विपक्ष की कसौटी पर परखा जाने लगे, तब निष्पक्ष रहने की कोशिश करने वाला पत्रकार भी संदेह के घेरे में आ जाता है। वह किसी एक खेमे के साथ नहीं खड़ा होता, तो दोनों खेमों की नाराजगी का सामना कर सकता है।
ऐसे में सवाल उठता है—क्या पत्रकारिता में स्वतंत्र रहने की कीमत अकेलेपन, उपेक्षा और अपमान के रूप में चुकानी पड़ेगी?
अगर ऐसा है, तो हमें पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर केवल भाषण देने के बजाय उसकी वास्तविक परिस्थितियों पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।
डिजिटल पत्रकारिता: मेहनत बराबर, सम्मान में अंतर क्यों?
पत्रकारिता के बदलते स्वरूप में डिजिटल मीडिया ने अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाई है। आज खबरें केवल अखबारों के पन्नों या टेलीविजन की स्क्रीन तक सीमित नहीं हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से स्थानीय घटनाएं, जनसमस्याएं, प्रशासनिक जवाबदेही और उन लोगों की आवाज भी व्यापक स्तर तक पहुंच सकती है, जिन्हें अक्सर बड़े समाचार मंचों पर पर्याप्त जगह नहीं मिलती।
डिजिटल पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग सीमित संसाधनों के बीच काम करता है। कई बार वही पत्रकार रिपोर्टिंग करता है, कैमरा संभालता है, वीडियो रिकॉर्ड करता है, खबर लिखता है, संपादन करता है और फिर उसे जनता तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी निभाता है।
धूप, बारिश, भीड़, तनावपूर्ण परिस्थितियों और कठिन फील्ड रिपोर्टिंग के बीच काम करने वाले इन पत्रकारों की मेहनत को केवल इसलिए कम नहीं आंका जा सकता कि उनका समाचार मंच किसी बड़े टेलीविजन नेटवर्क या प्रतिष्ठित अखबार का हिस्सा नहीं है।
फिर भी अनेक परिस्थितियों में डिजिटल मीडिया से जुड़े पत्रकारों को वह संस्थागत पहचान, औपचारिक स्वीकार्यता और सम्मान नहीं मिल पाता, जो मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को सहज रूप से मिल सकता है। प्रेस कार्यक्रमों में प्राथमिकता, सूचना तक पहुंच, प्रशासनिक संवाद और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसे मामलों में यह अंतर अनुभव किया जा सकता है।
यहां सवाल मुख्यधारा के पत्रकारों के सम्मान को कम करने का नहीं है। वे भी मेहनत करते हैं, जोखिम उठाते हैं और पत्रकारिता की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हैं। सवाल यह है कि सम्मान का पैमाना केवल संस्थान का नाम क्यों हो, पत्रकार की मेहनत, उसकी रिपोर्टिंग और उसके पेशेवर आचरण को भी बराबर महत्व क्यों न मिले?
क्या किसी स्थानीय मुद्दे पर जमीन से रिपोर्टिंग करने वाला डिजिटल पत्रकार कम महत्वपूर्ण है? क्या किसी गांव, कस्बे या मोहल्ले की समस्या को सामने लाने वाला पत्रकार इसलिए कम सम्मान का अधिकारी है, क्योंकि उसकी खबर किसी बड़े चैनल पर प्रसारित नहीं होती?
पत्रकारिता का मूल्यांकन उसके काम की गुणवत्ता, तथ्यात्मक विश्वसनीयता और जनहित में योगदान से होना चाहिए, केवल उसके मंच के आकार से नहीं।
मुख्यधारा की हीनता नहीं, पत्रकारिता में समान सम्मान की जरूरत
मुख्यधारा के मीडिया और डिजिटल मीडिया के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। दोनों के काम करने के तरीके, संसाधन, पहुंच और संस्थागत संरचनाएं अलग हो सकती हैं। लेकिन इन अंतरों को पत्रकारों के बीच ऊंच-नीच का आधार बना देना उचित नहीं है।
किसी बड़े संस्थान का परिचयपत्र अपने आप में किसी पत्रकार की योग्यता का अंतिम प्रमाण नहीं है। उसी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ा होना अपने आप में किसी पत्रकार की निष्पक्षता या विश्वसनीयता की गारंटी भी नहीं है। दोनों ही माध्यमों में जिम्मेदार और गैर-जिम्मेदार काम हो सकता है।
इसलिए जरूरत किसी एक माध्यम को श्रेष्ठ या दूसरे को कमजोर साबित करने की नहीं, बल्कि पत्रकारिता के पेशे में समान गरिमा और समान अवसरों की है।
यदि कोई डिजिटल पत्रकार तथ्यों के साथ रिपोर्टिंग कर रहा है, संबंधित पक्षों से जवाब मांग रहा है और जनता की समस्याओं को जिम्मेदारी से उठा रहा है, तो उसकी पेशेवर पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए। उसके काम को केवल इस आधार पर नजरअंदाज करना कि वह किसी बड़े मीडिया हाउस से नहीं जुड़ा है, पत्रकारिता की भावना के अनुरूप नहीं है।
पत्रकारिता में संस्थान का महत्व अपनी जगह है, लेकिन पत्रकार की गरिमा किसी संस्थान के नाम की मोहताज नहीं होनी चाहिए।
जनता की आवाज उठाने वाला पत्रकार खुद कब सुना जाएगा?
एक पत्रकार जब फील्ड में उतरता है, तो वह अक्सर उन लोगों से मिलता है जिनकी समस्याएं व्यवस्था तक नहीं पहुंच पातीं। वह टूटी सड़क दिखाता है, अस्पताल की कमियां सामने लाता है, विद्यार्थियों की परेशानी सुनता है, किसानों के सवाल उठाता है और प्रशासन से जवाब मांगता है।
वह दूसरों की समस्याओं को खबर बनाता है, लेकिन कई बार अपनी समस्याओं पर बोलने का अवसर उसे नहीं मिलता।
छोटे और स्वतंत्र डिजिटल समाचार संस्थानों में काम करने वाले अनेक पत्रकारों के सामने सीमित संसाधनों, आर्थिक अस्थिरता, विज्ञापन पर निर्भरता, सुरक्षा और पेशेवर पहचान जैसी चुनौतियां हो सकती हैं। हर पत्रकार की परिस्थिति एक जैसी नहीं होती, लेकिन इन समस्याओं पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
पत्रकार से उम्मीद की जाती है कि वह जनता के अधिकारों की बात करे। लेकिन पत्रकार के अपने पेशेवर अधिकारों, सुरक्षा, मेहनत और सम्मान पर चर्चा कौन करेगा?
यदि पत्रकारिता को मजबूत बनाना है, तो पत्रकारों के काम करने की परिस्थितियों पर भी बात करनी होगी। उन्हें तथ्यों की पुष्टि करने, स्वतंत्र रूप से रिपोर्टिंग करने और दबाव से मुक्त होकर काम करने के लिए उचित वातावरण मिलना चाहिए। पत्रकार की सुरक्षा, पेशेवर गरिमा और काम की निष्पक्ष समीक्षा किसी विशेष माध्यम की सुविधा नहीं, बल्कि स्वस्थ पत्रकारिता के लिए आवश्यक विषय हैं।
यह भी जरूरी है कि डिजिटल मीडिया से जुड़े पत्रकार अपनी पहचान और काम को पेशेवर मानकों के अनुरूप मजबूत करें। प्रेस परिचय, संस्थागत पारदर्शिता, खबरों की पुष्टि, आचार संहिता और गलतियों को सुधारने की व्यवस्था पत्रकारिता के प्रति भरोसा बढ़ा सकती है।
सम्मान की मांग के साथ जवाबदेही भी जरूरी है। अधिकारों की बात करने वाला पत्रकार अपने दायित्वों से अलग नहीं हो सकता। लेकिन दायित्वों की अपेक्षा करने वाले समाज और संस्थाओं को भी पत्रकार के सम्मान के प्रति संवेदनशील होना होगा।
पत्रकार की मेहनत का मूल्य उसकी पहुंच से नहीं, उसके योगदान से तय हो
पत्रकारिता का काम केवल बड़ी घटनाओं को कवर करना नहीं है। कभी किसी छोटे गांव की समस्या पूरे प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर देती है। कभी किसी स्थानीय नागरिक की शिकायत सार्वजनिक व्यवस्था की कमी उजागर कर देती है। कभी एक छोटी-सी रिपोर्ट उस समस्या पर ध्यान खींचती है, जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा था।
ऐसी रिपोर्टिंग का महत्व केवल इस बात से तय नहीं किया जा सकता कि उसे कितने लोगों ने देखा या वह किस बड़े मंच पर चली।
बेशक, डिजिटल पहुंच और दर्शकों की संख्या किसी खबर के प्रभाव को समझने के उपयोगी संकेत हो सकते हैं। लेकिन जनहित में की गई जिम्मेदार पत्रकारिता का मूल्य केवल लोकप्रियता से नहीं मापा जाना चाहिए।
पत्रकार की मेहनत में वह समय भी शामिल है जो वह किसी खबर की पुष्टि करने में लगाता है, वह जोखिम भी जो फील्ड में उठाता है, वह धैर्य भी जो किसी पीड़ित की बात सुनने में चाहिए और वह जिम्मेदारी भी जो खबर प्रकाशित होने के बाद पैदा होती है।
इन प्रयासों का सम्मान होना चाहिए। क्योंकि जब समाज पत्रकार के काम को केवल उसके मंच के आधार पर आंकता है, तब वह उस मेहनत को अनदेखा कर देता है जो खबर को जनता तक पहुंचाने के पीछे होती है।
पत्रकारिता का भविष्य: भरोसा, स्वतंत्रता और सम्मान
आज पत्रकारिता को एक साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है—विश्वसनीयता बनाए रखने की चुनौती, राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच स्वतंत्र रहने की चुनौती, डिजिटल माध्यमों में गलत सूचनाओं से निपटने की चुनौती और पत्रकारों की पेशेवर गरिमा बनाए रखने की चुनौती।
इन समस्याओं का समाधान किसी एक माध्यम को दोषी ठहराने से नहीं निकलेगा। इसके लिए समाचार संस्थानों, संपादकों, पत्रकारों, प्रशासन और पाठकों—सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
मीडिया संस्थानों को अपनी संपादकीय स्वतंत्रता और पारदर्शिता मजबूत करनी होगी। पत्रकारों को तथ्यों और नैतिक मानकों के प्रति प्रतिबद्ध रहना होगा। प्रशासन को वैध पत्रकारिता और कठिन सवालों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार बनाए रखना होगा। और समाज को भी आलोचना तथा अपमान के बीच का अंतर समझना होगा।
किसी पत्रकार की खबर से असहमति हो सकती है, उसके निष्कर्षों पर सवाल उठाए जा सकते हैं और उसकी रिपोर्टिंग की जांच की मांग भी की जा सकती है। लेकिन केवल उसके माध्यम, पहचान या विचार से असहमति के कारण उसे अपमानित करना उचित नहीं है।
पत्रकारिता को मजबूत बनाने का रास्ता पत्रकारों को खामोश करने में नहीं, बल्कि तथ्यों की कसौटी पर उनकी बात को परखने और गलतियों के लिए उचित जवाबदेही सुनिश्चित करने में है।
अंत में: पत्रकार को खेमे में नहीं, उसके काम में पहचानिए
पत्रकारिता का भविष्य केवल बड़े स्टूडियो, विशाल समाचार कक्षों या डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती पहुंच से तय नहीं होगा। उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह जनता का भरोसा कितना अर्जित करती है, कितनी ईमानदारी से सवाल उठाती है और कितनी जिम्मेदारी से तथ्यों को प्रस्तुत करती है।
आज जरूरत है कि पत्रकार को किसी राजनीतिक खेमे की पहचान से पहले एक पेशेवर के रूप में देखा जाए। उसकी आलोचना उसके काम के आधार पर हो, उसके मंच के आधार पर नहीं। उसकी मेहनत का मूल्यांकन उसकी रिपोर्टिंग के आधार पर हो, उसके संस्थान की प्रतिष्ठा के आधार पर ही नहीं।
डिजिटल पत्रकारिता को भी अपने दायित्वों के प्रति उतना ही गंभीर रहना होगा, जितना मुख्यधारा की पत्रकारिता को। वहीं मुख्यधारा के मीडिया और प्रशासनिक संस्थाओं को भी यह समझना होगा कि पत्रकारिता का सम्मान किसी विशेष मंच तक सीमित नहीं हो सकता।
मैं, प्रतीक्षा वर्मा, एडिटर-इन-चीफ, जनमंच समाचार के रूप में मानती हूं कि पत्रकारिता की असली ताकत किसी राजनीतिक दल की निकटता, किसी बड़े संस्थान की पहचान या किसी प्रभावशाली व्यक्ति के समर्थन में नहीं, बल्कि जनता के प्रति उसकी ईमानदारी में है।
जो पत्रकार जनता की आवाज उठाता है, उसे स्वयं भी सम्मान के साथ अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए। जो पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता है, उसकी नीयत पर आरोप लगाने से पहले उसके तथ्यों को परखा जाना चाहिए। और जो पत्रकार स्वतंत्र रहकर काम करना चाहता है, उसके लिए ऐसा वातावरण होना चाहिए जिसमें उसकी स्वतंत्रता उसकी सबसे बड़ी कमजोरी न बन जाए।
हमें यह तय करना होगा कि हम पत्रकारिता को राजनीतिक खेमों की पहचान बनाना चाहते हैं या लोकतंत्र में जवाबदेही का माध्यम बनाए रखना चाहते हैं।
क्योंकि पत्रकारिता का सम्मान केवल पत्रकार का सम्मान नहीं है। यह उस नागरिक के अधिकार का सम्मान भी है, जिसकी आवाज पत्रकार के माध्यम से समाज और व्यवस्था तक पहुंचती है।
पत्रकार बिकाऊ है या नहीं, इसका फैसला नारे नहीं, प्रमाण करेंगे। पत्रकार छोटा है या बड़ा, इसका फैसला केवल उसका संस्थान नहीं, उसका काम भी करेगा। और पत्रकारिता स्वतंत्र है या नहीं, इसकी असली कसौटी यह होगी कि वह कितनी ईमानदारी से जनता के सवाल उठाने का साहस रखती है।
कलम को खेमों में बांटने से पहले उसकी जिम्मेदारी को समझिए। डिजिटल पत्रकार की मेहनत को कम आंकने से पहले उसकी जमीन पर की गई रिपोर्टिंग को देखिए। और पत्रकार का सम्मान तय करने से पहले यह याद रखिए कि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला व्यक्ति भी सम्मान का अधिकारी है।
पत्रकारिता को बचाना है, तो केवल खबरों की नहीं, पत्रकारों की गरिमा की भी रक्षा करनी होगी। क्योंकि जब पत्रकार का सम्मान कमजोर होता है, तब जनता की आवाज उठाने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम भी कमजोर पड़ता है।
— प्रतीक्षा वर्मा
एडिटर-इन-चीफ, जनमंच समाचार



