Journalist Pratiksha Verma : जब बारिश घरों में घुस जाए, परिवारों की छतें ढह जाएं और सड़कों से लेकर पार्कों तक पानी भर जाए, तब सवाल सिर्फ मौसम का नहीं, विकास की तैयारियों का भी होता है।
तीन दिन की बारिश ने खोली विकास की पोल, घरों में पानी और आंखों में बेबसी
बारिश की बूंदें किसी किसान के लिए उम्मीद होती हैं, किसी बच्चे के लिए खुशी और किसी शहर के लिए मौसम की राहत। लेकिन जब यही बारिश लोगों के घरों में घुस जाए, गृहस्थी का सामान बहने लगे और मेहनत से बनाया गया आशियाना मलबे में तब्दील हो जाए, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच आम आदमी की सुरक्षा कहां खड़ी है?
उत्तर प्रदेश में पिछले दिनों हुई बारिश ने कई परिवारों की जिंदगी को मुश्किलों में डाल दिया है। कहीं खेतों में खड़ी फसल बर्बाद होने की चिंता है, तो कहीं सिर छिपाने के लिए बनाए गए घर के ढह जाने का दर्द। जिन परिवारों ने पाई-पाई जोड़कर अपना आशियाना बनाया, उनके लिए बारिश की हर बूंद अब राहत नहीं, बल्कि एक नई मुसीबत लेकर आ रही है।
गोरखपुर: स्पेन जैसे शहर के दावों के बीच घरों में घुसा पानी
गोरखपुर की तस्वीरें इस सवाल को और गंभीर बना देती हैं। भारी बारिश के बाद शहर के कई इलाकों में जलभराव हुआ, सड़कों पर पानी भर गया और लोगों के घरों-दुकानों तक में पानी घुस गया। घरों के भीतर रखा सामान पानी में तैरता नजर आया। लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी ठहर गई और उन्हें अपने ही घरों में मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
गोरखपुर के सांसद रवि किशन ने अगस्त 2026 में एक कार्यक्रम के दौरान शहर की तुलना स्पेन से करते हुए उसके विकास और खूबसूरती की तारीफ की थी। लेकिन सितंबर की बारिश के बाद सामने आई तस्वीरों ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सवाल किसी शहर की तारीफ करने पर नहीं है। सवाल यह है कि अगर शहर आधुनिक बन रहा है, तो क्या उसकी जलनिकासी व्यवस्था भी उसी रफ्तार से मजबूत हो रही है? क्या विकास का मतलब सिर्फ चौड़ी सड़कें, चमकती इमारतें और खूबसूरत चौराहे हैं, या फिर आम नागरिक का घर बारिश के पानी से सुरक्षित रखना भी विकास का हिस्सा है? जिस परिवार का बिस्तर, राशन, जरूरी कागजात और घर का सामान पानी में डूब जाए, उसके लिए स्मार्ट सिटी का दावा आखिर क्या मायने रखता है?
वाराणसी से लखनऊ तक: विकास के दावों की असली परीक्षा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी को क्योटो की तर्ज पर विकसित करने की परिकल्पना से जोड़ते रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में आधुनिक बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन किसी भी शहर के विकास की असली परीक्षा सिर्फ उसके निर्माण कार्यों से नहीं, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में नागरिकों को मिलने वाली सुविधाओं से भी होती है।
लखनऊ, जिसे प्रदेश की राजधानी होने के साथ-साथ प्रशासनिक और विकास के केंद्र के रूप में देखा जाता है, वहां भी बारिश के बाद कई इलाकों में जलभराव की खबरें सामने आईं। सड़कों पर पानी, फंसे वाहन और प्रभावित बाजारों ने लोगों की परेशानियां बढ़ाईं।
राजधानी के पार्कों और सार्वजनिक स्थलों तक में पानी भरने की तस्वीरें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय बारिश और जलनिकासी को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है? अगर शहर का एक बड़ा हिस्सा बारिश के बाद ठहर जाता है, तो यह केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि व्यवस्था की तैयारियों पर भी सवाल है।
गंगा एक्सप्रेसवे पर पानी: आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती
जिस गंगा एक्सप्रेसवे को उत्तर प्रदेश के विकास और बेहतर कनेक्टिविटी की बड़ी परियोजना के रूप में देखा जा रहा है, वहां भी बारिश के बाद जलभराव की खबर सामने आई। उन्नाव में बशीरतगंज टोल प्लाजा के पास एक्सप्रेसवे के एक हिस्से पर पानी जमा होने से यातायात प्रभावित हुआ।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि किसी भी परियोजना पर बारिश के दौरान पानी भर जाना अपने आप में उसके पूरे निर्माण को खराब साबित नहीं करता। लेकिन ऐसी घटनाएं यह जरूर पूछने का अवसर देती हैं कि जलनिकासी की योजना कितनी प्रभावी थी, निर्माण के दौरान स्थानीय परिस्थितियों का कितना ध्यान रखा गया और समस्या सामने आने के बाद उसे दूर करने की व्यवस्था कितनी तेज है।
आखिर एक्सप्रेसवे सिर्फ सड़क की एक लंबी पट्टी नहीं होता। वह हजारों यात्रियों के समय, सुरक्षा और भरोसे से जुड़ा होता है। इसलिए उस पर होने वाला हर निर्माण और रखरखाव का काम जवाबदेही के दायरे में आना चाहिए।
राजधानी लखनऊ का प्रेरणा स्थल भी जलभराव से अछूता नहीं!
राजधानी लखनऊ में भी बारिश ने विकास के दावों के बीच जलभराव की तस्वीर सामने रख दी। जिस प्रेरणा स्थल को शहर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों में गिना जाता है, वहां भी बारिश का पानी भर गया। इसकी तस्वीरें और वीडियो खुद हालात बयां कर रहे हैं।
लखनऊ जैसे शहर में, जहां बुनियादी सुविधाओं और आधुनिक विकास की चर्चा होती है, वहां सार्वजनिक स्थलों पर जलभराव व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े करता है। आखिर बारिश के पानी की निकासी के लिए क्या इंतजाम किए गए थे? क्या जलभराव से निपटने की योजना सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई?
गोरखपुर के घरों में घुसता पानी हो, गंगा एक्सप्रेसवे पर जलभराव हो या राजधानी के प्रेरणा स्थल में जमा बारिश का पानी—ये तस्वीरें एक ही सवाल पूछती हैं: विकास के दावों के बीच जलनिकासी की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
विदेशों की मिसाल और अपने शहरों की हकीकत
जब भी आधुनिक शहरों की बात होती है, विदेशों की चमचमाती सड़कों, व्यवस्थित यातायात और बेहतर नागरिक सुविधाओं का उदाहरण दिया जाता है। लेकिन किसी शहर की तुलना दूसरे देश के शहरों से करना तभी सार्थक है, जब हम वहां की व्यवस्थाओं से सीखने के लिए भी तैयार हों।
बारिश के बाद पानी कितनी जल्दी निकलता है, नालों की सफाई समय पर होती है या नहीं, निर्माण कार्यों में प्राकृतिक जलप्रवाह का ध्यान रखा जाता है या नहीं और आपदा के समय प्रशासन कितनी तत्परता से काम करता है—ये सभी सवाल किसी भी आधुनिक शहर की बुनियादी कसौटियां हैं।
यह कहना सही नहीं होगा कि विदेशों में बारिश के बाद कहीं पानी भरता ही नहीं। दुनिया के कई विकसित शहर भी भारी बारिश और बाढ़ से जूझते हैं। फर्क इस बात से पड़ता है कि वहां ऐसी परिस्थितियों से निपटने की तैयारी कैसी है और नुकसान होने पर लोगों को कितनी जल्दी राहत मिलती है।
भारत में भी तकनीक, इंजीनियरिंग और विकास परियोजनाओं पर बड़े स्तर पर काम हो रहा है। लेकिन तकनीक की सार्थकता तभी है, जब उसका लाभ उस आम नागरिक तक पहुंचे, जो हर महीने टैक्स देता है और बदले में सुरक्षित सड़क, साफ नाली, बेहतर आवासीय व्यवस्था और सम्मानजनक जीवन की उम्मीद करता है।
किसान की मेहनत से गरीब के आशियाने तक, नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
इस बारिश की सबसे बड़ी कीमत वे लोग चुका रहे हैं, जिनके पास नुकसान सहने के लिए बहुत कम संसाधन हैं। किसान की फसल डूब जाए तो उसकी महीनों की मेहनत और अगली फसल की उम्मीद पर संकट आ जाता है। किसी गरीब परिवार का घर गिर जाए तो उसके सामने रहने, खाने और बच्चों को सुरक्षित रखने तक का सवाल खड़ा हो जाता है।
ऐसे में सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी सिर्फ जलभराव हटाने तक सीमित नहीं हो सकती। प्रभावित परिवारों का नुकसान दर्ज करना, पात्र लोगों तक राहत पहुंचाना, क्षतिग्रस्त मकानों का आकलन करना और किसानों को नियमानुसार मुआवजा दिलाना भी उतना ही जरूरी है।
साथ ही, जिन इलाकों में बार-बार जलभराव होता है, वहां स्थायी समाधान की जरूरत है। नालों की सफाई, जलनिकासी नेटवर्क की क्षमता, निर्माण की गुणवत्ता और बारिश के पानी के प्राकृतिक बहाव को लेकर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
सवाल बारिश से नहीं, हमारी तैयारियों से है
बारिश को रोका नहीं जा सकता। प्रकृति पर किसी सरकार का नियंत्रण नहीं होता। लेकिन बारिश के पानी से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए तैयारी जरूर की जा सकती है। यही तैयारी किसी प्रशासन की कार्यक्षमता और किसी शहर के वास्तविक विकास को सामने लाती है।
तीन दिन की बारिश ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया, कई परिवारों को बेघर होने का डर दिया और शहरों की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए। अब जरूरत इन सवालों को नजरअंदाज करने की नहीं, बल्कि इनके जवाब तलाशने की है।
विकास का मतलब सिर्फ आसमान छूती इमारतें और चमचमाती सड़कें नहीं होता। विकास का मतलब यह भी है कि गरीब का घर सुरक्षित रहे, किसान की मेहनत बेकार न जाए और बारिश के बाद आम आदमी को अपनी ही सड़क पर नाव चलाने जैसी स्थिति का सामना न करना पड़े। क्योंकि जब बारिश का पानी घरों में घुस जाता है, तब विकास के सारे दावे दरवाजे के बाहर खड़े नजर आते हैं।जब बारिश का पानी घरों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर भर जाता है, तब विकास के दावों की नहीं, जमीन पर किए गए कामों की परीक्षा होती है। और तब सवाल उठता है—अगर विकास इतना आगे बढ़ चुका है, तो बारिश का पानी आज भी हमारे घरों से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा?
— प्रतीक्षा वर्मा की कलम से…



