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Journalist Pratiksha Verma:डिग्री हाथ में, उम्र निकल रही है… आखिर कब मिलेगी नौकरी?

शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करने के लिए दोनों दिशाओं में प्रयास करने होंगे शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करने के लिए दोनों दिशाओं में प्रयास करने होंगे

Journalist Pratiksha Verma:सरकारी भर्ती का इंतजार, योग्यता से अलग काम करने की मजबूरी और परिवार की उम्मीदों के बीच पिसता युवा—आखिर कब सुनेगी सरकार नौजवानों के मन की बात?

एक युवा अपनी आंखों में हजारों सपने लेकर पढ़ाई करता है। मां-बाप अपनी जरूरतों को कम करके उसकी किताबों, फीस और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर पैसा खर्च करते हैं। घरवालों को उम्मीद होती है कि एक दिन उनका बेटा या बेटी नौकरी हासिल करेगा, परिवार का सहारा बनेगा और वर्षों की मेहनत रंग लाएगी। लेकिन जब हाथ में डिग्री होने के बावजूद नौकरी नहीं मिलती, जब सरकारी भर्ती का इंतजार करते-करते उम्र निकलने लगती है और जब अपनी योग्यता से अलग काम करने की मजबूरी सामने आती है, तब उस युवा के मन में उठने वाले सवालों का जवाब कौन देगा?

यह केवल एक बेरोजगार युवक या युवती की कहानी नहीं है। यह उन तमाम परिवारों की चिंता है, जिन्होंने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए वर्षों तक संघर्ष किया है। यह उस युवा की पीड़ा है, जो मेहनत करने से पीछे नहीं हटता, लेकिन बार-बार अनिश्चितता के सामने खड़ा दिखाई देता है।

आखिर डिग्री हासिल करने के बाद भी रोजगार की तलाश इतनी लंबी क्यों है? और युवाओं को अपने भविष्य के लिए कब तक इंतजार करना पड़ेगा?

ये सवाल किसी राजनीतिक आरोप से अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके केंद्र में देश का वह युवा है, जिसके कंधों पर परिवार की उम्मीदें और देश के भविष्य की जिम्मेदारी रखी जाती है।

सपने बड़े हैं, लेकिन रास्ते इतने मुश्किल क्यों?

आज का युवा पढ़ना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है और अपने परिवार को बेहतर जीवन देना चाहता है। वह जानता है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, इसलिए वह अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए मेहनत करता है। कोई स्नातक की पढ़ाई करता है, कोई तकनीकी शिक्षा हासिल करता है, कोई शिक्षक बनने की तैयारी करता है, तो कोई प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना देखता है।

लेकिन शिक्षा पूरी होने के बाद जब वह रोजगार की तलाश में निकलता है, तब उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कहीं उसकी योग्यता के अनुरूप अवसर सीमित हैं, कहीं अनुभव की मांग है, कहीं वेतन उसकी जरूरतों के अनुकूल नहीं है और कहीं चयन प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि भविष्य की योजना बनाना कठिन हो जाता है।

ऐसे में युवा के सामने एक अजीब स्थिति पैदा होती है। उसने जिस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने के लिए वर्षों तक पढ़ाई की, उसी क्षेत्र में अवसर न मिलने पर उसे दूसरे काम की तलाश करनी पड़ती है।

कई बार वह अपनी रुचि और योग्यता से समझौता करके नौकरी स्वीकार करता है, क्योंकि उसके सामने आर्थिक जरूरतें होती हैं। घर चलाना है, परिवार की मदद करनी है और अपने खर्चों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना है।

यहां एक बात समझना जरूरी है कि करियर बदलना या किसी दूसरे क्षेत्र में काम करना अपने आप में गलत नहीं है। नए अवसर तलाशना और नई क्षमताएं विकसित करना भी सफलता का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब युवा को अपनी पसंद से नहीं, बल्कि रोजगार न मिलने की मजबूरी में बार-बार रास्ता बदलना पड़े, तो इस स्थिति पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।

युवा की योग्यता केवल नौकरी पाने का साधन नहीं, बल्कि उसकी मेहनत, समय और सपनों का परिणाम है। उस योग्यता को अवसरों से जोड़ना भी उतना ही जरूरी है।

सरकारी नौकरी की तैयारी में गुजरती उम्र, लेकिन भर्ती का इंतजार खत्म नहीं

देश के लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी केवल एक पद नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और परिवार की जिम्मेदारियां संभालने का सपना होती है। यही कारण है कि अनेक युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे रहते हैं।

वे अपनी दिनचर्या बदलते हैं, सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाते हैं, कई बार घर से दूर रहकर पढ़ाई करते हैं और सीमित संसाधनों में अपने लक्ष्य तक पहुंचने का प्रयास करते हैं। उनके परिवार भी इस उम्मीद में उनका साथ देते हैं कि एक दिन मेहनत का परिणाम जरूर मिलेगा।

लेकिन जब भर्ती विज्ञापन का इंतजार लंबा हो जाता है, परीक्षाएं समय पर नहीं होतीं, परिणाम आने में देरी होती है या चयन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती, तो युवा की चिंता बढ़ जाती है।

सबसे बड़ी परेशानी तब होती है, जब निर्धारित आयु सीमा नजदीक आने लगती है। जिस परीक्षा के लिए उसने कई साल लगाए, उसमें अवसर मिलने से पहले ही उसकी उम्र सीमा समाप्त होने का डर सामने खड़ा हो जाता है। इस स्थिति में केवल एक परीक्षा का अवसर नहीं, बल्कि उसके वर्षों के प्रयास और भविष्य की योजनाएं भी दांव पर लगती दिखाई देती हैं।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी पद पर भर्ती की आवश्यकता है, तो उसकी प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? यदि किसी कारण से देरी होती है, तो अभ्यर्थियों को उसकी स्पष्ट जानकारी क्यों न मिले? और क्या भर्ती प्रक्रिया में अनिश्चितता कम करने के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था विकसित नहीं की जानी चाहिए?

हर भर्ती में देरी के कारण अलग हो सकते हैं। कहीं प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, कहीं कानूनी विवाद और कहीं अन्य व्यावहारिक कठिनाइयां। इसलिए हर मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन कारण चाहे जो भी हों, अभ्यर्थियों के समय और भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

परीक्षा की तैयारी में लगा युवा केवल नौकरी का इंतजार नहीं करता, वह अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को एक उम्मीद के सहारे लगाता है।

उस उम्मीद को अनिश्चितता में बदलने से रोकना भर्ती व्यवस्था की भी जिम्मेदारी है।

सरकार कहती है, रोजगार के अवसर हैं—फिर युवा परेशान क्यों?

रोजगार को लेकर सरकारों की ओर से विभिन्न योजनाओं, भर्ती अभियानों, कौशल विकास कार्यक्रमों और स्वरोजगार के अवसरों की चर्चा होती है। इन पहलों का उद्देश्य महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन किसी भी रोजगार नीति की सफलता को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि उसका लाभ कितने युवाओं तक पहुंच रहा है और उससे उनके जीवन में क्या बदलाव आ रहा है।

रोजगार की स्थिति को केवल घोषणाओं या अवसरों की संख्या से नहीं समझा जा सकता। यह भी देखना होगा कि कितने लोगों को वास्तव में काम मिला, उन्हें कितना वेतन मिल रहा है, रोजगार कितना स्थिर है और क्या काम उनकी योग्यता के अनुरूप है।

यदि कोई युवा नौकरी कर रहा है, लेकिन उसकी आय बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो उसकी आर्थिक परेशानी समाप्त नहीं हो जाती। यदि किसी को रोजगार मिल भी गया है, लेकिन वह अपनी पढ़ाई और कौशल का उपयोग नहीं कर पा रहा, तो उसके सामने करियर विकास की चुनौती बनी रह सकती है।

इसी तरह स्वरोजगार और व्यवसाय के अवसर उपयोगी हैं, लेकिन हर युवा के पास व्यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी, बाजार तक पहुंच या जोखिम उठाने की समान क्षमता नहीं होती।

इसलिए रोजगार संबंधी किसी भी दावे का मूल्यांकन विश्वसनीय आंकड़ों, वास्तविक अवसरों और उनके परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

सरकार यदि रोजगार के अवसर बढ़ने की बात कहती है, तो यह जानना भी जरूरी है कि वे किन क्षेत्रों में बढ़ रहे हैं, किन योग्यताओं की मांग है और युवाओं को उन अवसरों तक पहुंचाने के लिए क्या व्यवस्थाएं की जा रही हैं।

वहीं युवाओं की शिकायतों को भी गंभीरता से सुनना चाहिए। यदि कोई अभ्यर्थी भर्ती में देरी की बात कर रहा है, कोई युवा अपनी योग्यता के अनुरूप काम न मिलने की समस्या बता रहा है या कोई परिवार रोजगार की अनिश्चितता से जूझ रहा है, तो इन अनुभवों को केवल नकारात्मक सोच कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

रोजगार की वास्तविक तस्वीर घोषणाओं और शिकायतों में से किसी एक को चुनने से नहीं, बल्कि तथ्यों, आंकड़ों और जमीन पर मौजूद परिस्थितियों को साथ रखकर समझने से सामने आएगी।

मां-बाप की उम्मीदें और युवा के मन का दबाव

बेरोजगारी का असर केवल उस युवा तक सीमित नहीं रहता, जिसके पास नौकरी नहीं है। इसका प्रभाव उसके परिवार और सामाजिक जीवन पर भी पड़ सकता है।

एक पिता अपनी कमाई का हिस्सा बेटे की पढ़ाई के लिए बचाता है। एक मां अपने बच्चे के सफल होने की उम्मीद में उसका हौसला बढ़ाती है। परिवार अपनी जरूरतों को सीमित करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहयोग करता है। हर घर की परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन बेहतर भविष्य की उम्मीद लगभग हर परिवार के लिए महत्वपूर्ण होती है।

जब वर्षों की मेहनत के बाद भी रोजगार नहीं मिलता, तो युवा को आर्थिक निर्भरता के साथ-साथ सामाजिक अपेक्षाओं का भी सामना करना पड़ सकता है। कभी रिश्तेदार सवाल पूछते हैं, कभी परिचित तुलना करते हैं और कभी युवा खुद ही अपने प्रयासों को लेकर चिंता करने लगता है।

उसे यह महसूस हो सकता है कि उसके साथ पढ़ने वाले दूसरे लोग आगे बढ़ रहे हैं, जबकि वह अब भी तैयारी या नौकरी की तलाश में लगा है।

लेकिन क्या किसी युवा की सफलता का पैमाना केवल यह होना चाहिए कि उसे कितनी जल्दी नौकरी मिल गई?

बिल्कुल नहीं। हर व्यक्ति की परिस्थितियां, अवसर और यात्रा अलग होती है। बेरोजगार होना किसी व्यक्ति की योग्यता, मेहनत या सम्मान को कम नहीं करता। रोजगार की तलाश में संघर्ष कर रहे युवाओं को ताने देने के बजाय उनकी स्थिति को समझना चाहिए।

परिवार और समाज को उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी आवश्यक है कि रोजगार तक पहुंचने के रास्ते अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक बनाए जाएं।

युवा को केवल धैर्य रखने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उसे सही मार्गदर्शन, कौशल विकसित करने के अवसर, रोजगार की विश्वसनीय जानकारी और अपनी क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ने का रास्ता भी मिलना चाहिए।

डिग्री और रोजगार के बीच की दूरी कौन कम करेगा?

शिक्षा किसी भी समाज की प्रगति की बुनियाद है। लेकिन शिक्षा से रोजगार तक पहुंचने की प्रक्रिया में यदि पर्याप्त तालमेल न हो, तो युवाओं के सामने कठिनाइयां बढ़ सकती हैं।

कई क्षेत्रों में रोजगार के लिए विशेष कौशल, व्यावहारिक अनुभव और तकनीकी जानकारी की जरूरत होती है। वहीं कुछ क्षेत्रों में उपलब्ध नौकरियों और नौकरी चाहने वाले युवाओं की संख्या के बीच अंतर हो सकता है।

ऐसे में शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों को केवल परीक्षा पास करने तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें बदलते रोजगार बाजार की जरूरतों से भी परिचित कराएं। करियर मार्गदर्शन, व्यावहारिक प्रशिक्षण, इंटर्नशिप और उद्योगों से संवाद जैसी व्यवस्थाएं इस दिशा में मददगार हो सकती हैं।

सरकार और संबंधित संस्थाओं को भी स्थानीय स्तर पर रोजगार की संभावनाओं, उद्योगों की जरूरतों और युवाओं के कौशल के बीच तालमेल बढ़ाने पर काम करना चाहिए।

लेकिन यह भी याद रखना होगा कि हर समस्या का समाधान युवाओं को और अधिक प्रशिक्षण देने में नहीं है। यदि रोजगार के अवसर पर्याप्त नहीं हैं, तो केवल नए कौशल सीखने की सलाह से समस्या का पूरा समाधान नहीं हो सकता।

युवाओं को रोजगार के योग्य बनाना जरूरी है, लेकिन उनकी योग्यता के उपयोग के लिए अवसर पैदा करना भी उतना ही जरूरी है।

शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करने के लिए दोनों दिशाओं में प्रयास करने होंगे—युवाओं की क्षमताओं को मजबूत करना और अर्थव्यवस्था में ऐसे अवसर बढ़ाना, जहां उन क्षमताओं का उपयोग हो सके।

युवाओं से मेहनत की उम्मीद, व्यवस्था से जवाबदेही क्यों नहीं?

युवाओं को अक्सर सलाह दी जाती है कि वे मेहनत करें, कौशल बढ़ाएं, प्रतियोगिता के लिए तैयार रहें और असफलता से घबराएं नहीं। निश्चित रूप से मेहनत, अनुशासन और सीखने की इच्छा सफलता के महत्वपूर्ण आधार हैं।

लेकिन क्या रोजगार से जुड़ी हर समस्या का समाधान केवल युवा की मेहनत में तलाशा जा सकता है?

यदि भर्ती प्रक्रिया में देरी हो रही है, रिक्त पदों की जानकारी स्पष्ट नहीं है, शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल कमजोर है या उपलब्ध अवसरों तक पहुंचने में कठिनाइयां हैं, तो इन सवालों का जवाब संस्थागत स्तर पर भी देना होगा।

सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता और समयबद्धता, रोजगार योजनाओं के परिणामों का आकलन, युवाओं के लिए विश्वसनीय जानकारी और रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों में अवसरों का विस्तार—ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर लगातार काम करने की आवश्यकता है।

युवाओं को भी अपने कौशल को विकसित करने, नए क्षेत्रों की जानकारी हासिल करने और उपलब्ध विकल्पों पर विचार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। लेकिन यह जिम्मेदारी केवल उन्हीं के कंधों पर नहीं डाली जा सकती।

एक मजबूत व्यवस्था वही होती है, जिसमें व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी निभाने का अवसर मिले और संस्थाएं भी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेह रहें।

देश की युवा शक्ति का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि कितने युवा परीक्षाओं में बैठ रहे हैं, बल्कि इस बात में भी है कि कितने युवा अपनी क्षमता का उपयोग करके आर्थिक और सामाजिक प्रगति में योगदान दे पा रहे हैं।

अंत में: युवाओं को केवल सपने मत दिखाइए, उनके लिए रास्ते भी बनाइए

किसी देश का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी से जुड़ा होता है। युवा नई सोच लाते हैं, नई तकनीक सीखते हैं, नए व्यवसाय शुरू करते हैं और समाज को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं। लेकिन उनकी क्षमता का पूरा लाभ तभी मिल सकता है, जब उन्हें शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच आगे बढ़ने के वास्तविक अवसर प्राप्त हों।

हर युवा को सरकारी नौकरी मिले, यह संभव नहीं है। निजी क्षेत्र, स्वरोजगार, उद्यमिता और नए कार्यक्षेत्रों में भी विकास की संभावनाएं हैं। लेकिन हर क्षेत्र में उचित अवसर, सम्मानजनक काम और आगे बढ़ने की संभावनाएं उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।

सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले युवा को भी यह भरोसा मिलना चाहिए कि भर्ती प्रक्रिया यथासंभव पारदर्शी और समयबद्ध होगी। निजी क्षेत्र में काम तलाशने वाले युवा को अपनी योग्यता के अनुरूप अवसर खोजने में सहायता मिलनी चाहिए। और जो युवा अपनी दिशा बदलकर नया काम शुरू करना चाहता है, उसे प्रशिक्षण तथा मार्गदर्शन के रास्ते मिलने चाहिए।

मैं, प्रतीक्षा वर्मा, एडिटर-इन-चीफ, जनमंच समाचार के रूप में मानती हूं कि युवाओं के रोजगार का सवाल किसी एक बयान, एक योजना या एक राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह देश की आर्थिक प्राथमिकताओं, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़ा विषय है।

युवाओं की परेशानियों को समझने के लिए उनके अनुभव सुनने होंगे। रोजगार संबंधी दावों को परखने के लिए आंकड़ों को देखना होगा। भर्ती में देरी हो तो उसके कारणों और समाधान पर बात करनी होगी। और जहां अवसरों की कमी हो, वहां उन्हें बढ़ाने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे।

क्योंकि युवा केवल आज नौकरी तलाशने वाला व्यक्ति नहीं है। वह कल का शिक्षक, इंजीनियर, किसान, उद्यमी, वैज्ञानिक, कर्मचारी और देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाला नागरिक भी है।

उसके समय का सम्मान करना, उसकी मेहनत को अवसरों से जोड़ना और उसके भविष्य को लेकर गंभीर होना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

डिग्री हाथ में होना एक उपलब्धि है, लेकिन उस डिग्री के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिलना भी जरूरी है। उम्र का गुजरना जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन भर्ती के इंतजार में अनिश्चितता के बीच फंसे युवाओं की समस्याओं को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

युवाओं को यह कह देना आसान है कि वे देश का भविष्य हैं। कठिन काम ऐसा वर्तमान तैयार करना है, जिसमें वे अपनी मेहनत से उस भविष्य को सच बना सकें।

क्योंकि जिस युवा ने अपने सपनों के लिए सालों मेहनत की है, उसे केवल इंतजार नहीं—अपनी योग्यता साबित करने का अवसर भी मिलना चाहिए।

— प्रतीक्षा वर्मा
एडिटर-इन-चीफ, जनमंच समाचार

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